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कबीर(1398-1518)

कबीर के नाम से हर भारतीय परिचित है। राम और अल्लाह के इस भक्त ने ईष्वर को पाने का एक नया रास्ता दिखाया। वे रुढिवादी प्रथा और जाति आधारित अन्याय के विराध का प्रतिक थे। गुरु नानक ने उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु माना था। गुरु ग्रंथ साहिब में कबीर के 500 से अधिक छंद है।
(Kabir is a household name in India. Worshipper of both Ram and Allah he blzed a new path of god and was a symbol of protest against orthodox religious practice and caste based injustices. Guru Nanak acknowledged him as one of his apiritual precursors. The holy scripture of Sikhs, Guru Granth Sahib,contains over 500 verses by Kabir.)



माटी कहे कुम्हार से

तु क्या रौंदे मोहे।

इक दिन ऐसा आएगा,

मैं रौंदूंगी तोहे।।

-कबीर

कबीर के इस प्रचलित व गहन दोहे में जीवन

की नष्वरता को समझाते हुये कहते हैं,

जिस माटी को कुम्हार रौंदता हैं,

मृत्यु के बाद इसी माटी में उसे और हमें मिल जाना हैं।


(To the potter says the soil:
Think not you could knead me;
A day would come
When I will Knead you.)




अषी धरती ची माया,
अरे, तिले नाही सीमा,
दुनिया चे सर्वे पोटं,
तिच्या मधी झाले जमा।।
-बहीणाबाई
धरती की माया असीम है, अपार है।
दुनिया कम उदर कम लिये उसके भीतर पर्याप्त अन्न भंडार है।
(What affection the earth has-
Oh! It is Boundless !
All the bellies there are in the world-
She has reserves to feed them all.)


अषी धरती ची माया,

अरे, तिले नाही सीमा,

दुनिया चे सर्वे पोटं,

तिच्या मधी झाले जमा।।

-बहीणाबाई

धरती की माया असीम है, अपार है।

दुनिया कम उदर कम लिये उसके भीतर पर्याप्त अन्न भंडार है।

;What ffaection the earth has-

Oh! It is Boundless !

All the bellies there are in the world-

She has reserves to feed them all.)

लूकीयां छुपीयां कदे नां रहंदीया

सांझां एस जहान दीयां।

मिट्टी दे विच मिट्टी होईयां,

सांझा सब इन्सान दीयां।।

                 -उस्ताद दामन

इस दुनिया में जो कुछ सांझा है, हम सबका है, वो कभी छुप नहीं सकता। यह सब मिट्टी से निकला है और मिट्टी में ही मिल जाएगा।

(What we share in this world
Can never remain hidden;
What we humans share
Turns soil in the soil one day.)


रहिमन अब वे बिरछ कहाँ,

जिनकी छांह गंभीर।

बागन बिच बिच देखियत,

सेहुड कुंज करीर।।

-रहीम

रहीम पुछते हैं कि घनी छाया वाले वे पेड कहाँ?

अब तो बाग के बीच में सेहुड(लंबे पत्ते वाला पेड), कुंज(बेल) और करीर(करील झाडी) ही दिखते है।

(Where are those trees, Rahiman,
With dark sades?
In the garden are seen scattered
Sebud, creepers and bushes!)



फरीद खाक न निंदीऐ,

खाकु जेडु न कोइ।

जीवदिआ पैरा तले,

मुइआ उपरि होइ।।

-बाबा फरीद

फरीद कहते हैं, माटी की कभी निंदा न कीजिए क्योंकि माटी जैसा कोई नहीं है।

जीते जी हमारे पैरों के नीचे होती है और मरने के बाद हमारे उपर होती है।
(Insult not the soil, Farid says,
The soil has no match;
Under our feet till we breath,
Above us when we breathe our last.)


माटी कुदम करेंदी यार

माटी माटी नुं मारन लगी,

माटी दे हथियार।

जिस माटी पर बहुती माटी,

तिस माटी हुकार।।

-बुल्ले सा

दोस्त, माटी कूद रही है। मानव के ही बनाये हथियार से, मानव मानव को मार रहे है।

जिसके पास अधिक माटी यानि धन-संपत्ति है वे अहंकार से भरे है।

(The soil is in ferment.
The soil is up in arms against soil,
Weapons get made of soil;
Mortals that have more soil on them
Strut about with swollen pride.)


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