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पराया सुख
Kahani धनीराम के कमरे के आगे एक पेड़ था। उस पर बहुत सारी चिड़ियाँ अपना-अपना घोसला बनाकर रहती थी। एक चिड़ी के मन में ना जाने क्या आई कि वह धनीराम के कमरे के अंदर हिल गई। वह दिन भर बाहर उड़ती फिरती और शाम को ज्यों ही धनी राम कमरा खोलता, अंदर आ जाती। पर्दे के पीछे छुप कर बैठ जाती। रात भर आराम करती। सुबह जब धनीराम खड़ा होकर कमरा खोलता, वह कमरे के बाहर निकल जाती। अगर कमरा खुला होता तो वह पूरी दोपहर कमरे में सुस्ताती। वहां उसे कूलर और पंखे की ठंडी हवा लगती। धनीराम के कमरे में उसे बड़ा आराम था। न घोंसला बनाने की तोहमत न आंधी तूफान में घोंसला टूटने का डर। लेकिन एक रात धनीराम जल्दी खड़ा होकर कहीं बाहर चला गया। सुबह हो गई लेकिन धनीराम ने आकर दरवाजा नहीं खोला। चिड़ी अंदर कैद हो गई। बाहर चिड़ियाए चहचहा रही थी। उड़ रही थी। लेकिन वह अंदर बंद थी। उसने कमरे में चारों और कई चक्कर लगाये। लेकिन बाहर निकलने के लिए उसे कोई सुराख़ नजर नहीं आया। चिड़ी बहुत घबराई। दिन ज्यों ज्यों चढ़ रहा था, उसकी घबराहट बढ़ रही थी। इसी प्रकार दोस्तों हमें खुद पर न...
शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ का जीवन परिचय और प्रमुख रचना
शिवप्रसाद मिश्र ‘ रुद्र ’ का जन्म सन् 1911 में काशी में हुआ। उनकी शिक्षा काशी के हरिश्चंद्र कोलेज , क्वींस कोलेज एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हुई। रुद्र जी ने स्वूफल एवं विश्वविद्यालय मंे अध्यापन कार्य किया और कई पत्रिकाओं का संपादन भी किया। बहुभाषाविद् रुद्र जी एक साथ ही उपन्यासकार , नाटककार , गीतकार , व्यंग्यकार , पत्राकार और चित्राकार थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं - बहती गंगा , सुचिताच ( उपन्यास) , ताल तलैया , गशलिका , परीक्षा पचीस ( गीत एवं व्यंग्य गीत संग्रह)। उनकी अनेक संपादित रचनाएँ काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हुईं हैं। वे सभा के प्रधनमंत्री पद पर भी रहे। सन् 1970 में उनका देहांत हो गया। रुद्र जी अपनी जन्मभूमि काशी के प्रति आजीवन निष्ठावान रहे और उनकी यही निष्ठा उनके साहित्य में व्यक्त हुई है , विशेषकर उनकी अनुपम कृति बहती गंगा में। बहती गंगा को कुछ विद्वान उपन्यास मानते हैं तो वुफछ उसे कहानी-संग्रह भी मानते हैं।
बहुत सुन्दर !
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Comment करने के लिए धन्यवाद आपका ब्लॉग बहुत अच्छा है व ज्ञानवर्धक है.
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